हम और हमारा ब्रह्मांड, मैं और मेरी चेतना !
हम इस ब्रह्मांड में हैं । हमारा ब्रह्मांड भौतिक पदार्थों से बना है।
हमारा ब्रह्मांड चांद, सितारों, ग्रह, नक्षत्रों, पृथ्वी इत्यादि पिंडों से भरे हुए हैं । ये सारे के सारे भौतिक पदार्थ हैं। ये सारे के सारे ऊर्जा हैं। हमारे ब्रह्मांड में ऊर्जा भरे हुए हैं। इस ऊर्जा को हम भौतिक ऊर्जा कह सकते हैं । हमारे ब्रह्मांड के प्रकाश, ध्वनि इत्यादि सभी तरंगें भी ऊर्जा हैं । सभी चीजों को हम भौतिक ऊर्जा कह सकते हैं। ये पूरी ऊर्जा हमारे ब्रह्मांड की है। यही ऊर्जा भौतिक पदार्थों का रूप धारण करती है। जैसा कि पहले के भागों में बताया गया है कि हमारे ब्रह्मांड के सभी पिंड आकाश के छोटे छोटे पाकेटों में रहते हैं। सभी जड़ या चेतन छोटे छोटे कणों से बने हुए हैं । ये कण छोटे छोटे पाकेटों में अवस्थित रहते हैं । सबसे छोटा कण एक पाकेट को ग्रहण करता है। एक पाकेट से छोटा कण हमारे ब्रह्मांड मे नहीं रह सकता है। इससे छोटा होते ही यह कण हमारे ब्रह्मांड से गायब हो जाएगा और वृहद ब्रह्मांड में चला जाएगा। हमारा यह भौतिक शरीर भी हमारे ब्रह्मांड के कणों से निर्मित है। हमारे ब्रह्मांड के पाकेटों के अंदर और बाहर सभी जगह चेतना(आत्मा) रूपी शक्ति विद्यमान है। यही शक्ति हमारे ब्रह्मांड के भौतिक पदार्थों में चेतना प्रदान करती है जिसके चलते कोई भी पदार्थ अस्तित्व में रहती है।
हमारा शरीर भी भौतिक पदार्थो से बना हुआ है । हमारा ये भौतिक शरीर चेतना के सागर में अवस्थित है जिसके कारण हमारे पूरे शरीर में चेतना भरी हुई है। हमारे शरीर के हर अंग में , हर कण में चेतना भरी हुई है । हमारे शरीर मे भरी हुई चेतना का केन्द्र हमारा मन है जहां से पूरे शरीर के क्रियाओं का नियंत्रण होता है । हमारा मन दो भागों में कार्य करता है। एक अन्तर्मन , जो आंतरिक क्रियाओं को नियंत्रित करता है। अन्तर्मन सदैव जागृत अवस्था में होता है। दूसरा वाह्य मन , जो शरीर के वाह्य क्रियाओं को नियंत्रित करता है। वाह्य मन सदैव जागृत नहीं रहता है। जब हम निद्रा मे चले जाते हैं तो वाह्य मन सो जाता है परंतु अन्तर्मन सदैव जागृत रहता है। हमारा पूरा ब्रह्मांड यानि हमारे ब्रह्मांड के सभी पिंड आत्मा रूपी दिव्य शक्ति के अधीन है जो सभी पिंडों में चेतना दे रही है। हमारे ब्रह्मांड के सभी पिंड भिन्न भिन्न शारीरिक रूपों हैं और अपने शरीर के अनुरूप चेतना द्वारा क्रियाशील हैं। कुछ विभिन्न जीव जंतुओं के रूप मे , कुछ विभिन्न बनस्पतियों के रूप में, कुछ पत्थर पहाड़ों के रूप में, कुछ अन्य रूपों में इत्यादि इत्यादि । ब्रह्मांड का ऐसा कोई भी कण ऐसा नहीं है जिसमें चेतना नहीं हो।
उदाहरण स्वरूप हम एक वर्फ के टुकड़े को लेते हैं जो पानी के अंदर रखा हुआ है। यहाँ हम गौर करें तो ये जानते हैं कि वर्फ का हर कण पानी से बना हुआ है और पानी मे ही समाहित है । उसी प्रकार हमारे ब्रह्मांड के पिंड भी आत्मा रूपी दिव्य शक्ति से बने हुए हैं और उसी मे समाहित हैं। जिस प्रकार वर्फ अंततः अपना अस्तित्व खोकर पानी में ही मिल जाता है और पानी बन जाता है उसी प्रकार हमारे ब्रह्मांड के पिंड भी अपना अस्तित्व खोकर अंततः उस दिव्य शक्ति में विलीन हो जाते हैं। हमारे ब्रह्मांड के पिंड वृहद ब्रह्मांड में चले जाते हैं , उसके आगे शून्य में (दिव्य शक्ति में ) विलीन हो जाते हैं।
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