हमारा ब्रह्मांड स्थिर है !

 तदेजति  तन्नऐजति तद दूरे तदन्तिके । 

तदन्तरस्य  सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाहयतः ।। 

             यह  श्लोक ईशावास्य उपनिषद का पांचवां श्लोक है । 

इसमें कहा गया है कि वह स्थिर है और गतिशील भी है। वह सबसे दूर भी है और सबसे पास भी है। देखने में यह विरोधाभास लग रहा है। परन्तु यह विरोधाभास नहीं है । बस इसे ध्यान से समझने की आवश्यकता है।

जब कोई घटना विरोधाभासी दिखती है तो वास्तव में वह विरोधाभासी नहीं होती है बल्कि हमें विरोधाभासी प्रतीत होती है।

हमारे ब्रह्मांड की संरचना कैसी है? इसपर सदियों से ऋषि मुनि एवं वैज्ञानिकों द्वारा प्रयास किया जा रहा है।

जिस दिन ब्रह्मांड की संरचना समझ में आ जाएगी, पूरा विरोधाभास समाप्त हो जाएगा। क्योंकि इस विरोधाभासी वाक्य के जरिए ब्रह्मांड की संरचना को अति संक्षिप्त रूप से बताया गया है।


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